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जब गरीब मरता है 7 दर्दभरी हक़ीकतें और क्रूर समाज की अनदेखी सच्चाई

जब गरीब मरता है: 7 दर्दभरी हक़ीकतें और क्रूर समाज की अनदेखी सच्चाई

भूमिका:

जब कोई बड़ा आदमी यानी जोड़-तोड़ वाला मर जाता है — जैसे कोई एक्टर, कोई नेता, या कोई धनी आदमी — लगता है सारी दुनिया रुक सी जाती है। न्यूज़ चैनल ठहर जाते हैं, अख़बार में उनकी फोटो पहले पन्ने पर छपती है, सोशल मीडिया पर लोग श्रद्धांजलियां देते हैं। लोग ज्ञान बांटते हैं — “पैसे से सब कुछ नहीं मिलता”, “रिश्ते ही असली धन हैं”, “सब अंत में मिट्टी में मिल जाएंगे”।

पर जब एक गरीब आदमी मरता है?

न कोई समाचार, न कोई हल्ला गुल्ला। न टीवी पर, न कहीं मोमबत्ती जलाई जाती है। वो बस शांति से मर जाता है — भीड़ में गुमनाम, अपनी हालत और भूख संग।

1. विपरीत बातें और समाज का पाखंड:

समाज अपने ही उसमें दो बातें बोलता है —“पैसा ही सब कुछ है।”“पैसा ही सब कुछ नहीं है।”

लोग पैसा कमाने को नौकरियां बदलते हैं, रिश्ते तोड़ते हैं & यहां तक कि ज़मीर भी बेच देते हैं — फिर भी वही लोग कहते हैं कि “पैसा कोई मायने नहीं रखता”।

जब अमीर की बात होती है, उसे ‘सेल्फ-मेड’, ‘प्रेरणा’ जैसे शब्दों से नवाजा जाता है। पर जब गरीब संघर्ष करता है, मेहनत करता है — तो उसे ‘पीछड़ा’, ‘गैरज़रूरी’ कहकर छोड़ देते हैं।

क्या यही सच में हमारा समाज है?जहां अमीर की मौत पर रोते हैं & गरीब की ज़िंदगी पर कोई बात नहीं करता?

2. गरीब की मौत और हमारी संवेदनहीनता

गरीब रोज़ मरता है — भूख से, बीमारी से, कर्ज़ से, या खुद को मार लेता है। पर उसकी मौत चर्चा में नहीं आती, क्योंकि न उसके पास नाम है न साख।उसकी हालात TRP नहीं लाती।

एक मजदूर 14 घंटे काम करके जब हार जाता है — तो अख़बार में यदि उसका नाम आता भी है, तो निचले कोने के दो लाइनों में बस।

ऐसा क्यों?

क्योंकि वो हमारी दुनिया का ‘अहम हिस्सा’ नहीं, सिर्फ ‘पृष्ठभूमि’ है। एक ऐसा इंसान जो बस सेवा देता रहता है — जब तक वो थक कर हार न जाए।

3. रिश्ते और गरीब की हकीकत

जब अमीर दावा करते हैं “रिश्ते ही असली पूँजी हैं”, तो उनके ये रिश्ते अकसर ब्रांडिंग का मीटियल होते हैं — बर्थडे में मुस्कान, सोशल मीडिया पर ‘परिवारों की सराहना’।

मगर गरीब?

वो अपनी पत्नी के लिए आधी रोटी छोड़ देता है। माँ के इलाज के लिए ख़ून बेच देता है। दोस्तों के लिए जेवर गिरवी रख देता है।

वो रोज़ रिश्तों को निभाता है — बिना किसी दिखाईदारी के, बिना किसी इंस्टाग्राम पोस्ट के।

तो असली पूँजी कौन जीता है?

4. सिस्टम की खामोशी और न्याय का सवाल:

एक गरीब जब सत्तायन्त्र के खिलाफ़ बोलता है, उसे ‘गद्दार’ करार दिया जाता है।जब वो न्याय चाहता है, उसे ‘गड़बड़ियों का सरताज’ कहा जाता है।जब वो विवश होकर खुद को खत्म कर देता है, उसे ‘घटिया मानसिकता’ वाला कहकर भुला दिया जाता है।

पर जब कोई अमीर जेल जाता है — मीडिया कहता है “वो उदास थे”, “हालात खराब थे”।

न्याय तब मिलता है, जब जेब में वकील हो।

5. भाग्य बनाम दुर्भाग्य:

हमारे समाज में ‘भाग्य’ नामक एक आम शब्द प्रचलित हो गया है।गरीबों के दुर्भाग्य का आसान बहाना — “उसका भाग्य ही ऐसा था।”पर क्या ये हकीकत है?

नो सिरी!वो गरीब इसलिए मरता क्योंकि हमने उसे मरने दिया। उसकी जेब खाली होती, पास कोई ध्यान देने वाला नहीं। वो हार नहीं रहा होता, हम उसे हरा रहे होते हैं — समाज और हमारी चुप्पी से भी ज्यादा।

6. विरोधाभास और दिखावे का जाल:

हमारा समाज विरोधाभासों से चमकता पलटेगा:

गरीब को ईमानदार मानते हैं, पर अमीर को सिर पर बिठाते हैं।

शिक्षा की मसरूफियत करते हैं, पर अध्यापक को इज़्ज़त नहीं देते।

सब को बराबरी की बात करते हुए भी जातियों में बंटे रहते हैं।

हर हफ्ते मोटिवेशनल वीडियो देखते रहते हैं, लेकिन सड़क पर भीख मांगने वाले बच्चे में नजरें फेर लेते हैं।

सब धोखा फरेब!

असलियत यह कि हम इतना संवेदनशील बन गए हैं — कि सिर्फ वही देख पाते जो कैमरा दिखा दे।

7. WhatsApp ज्ञान और असली भूख:

रिश्ते बचाओ”, “पैसा बेकार”, “प्यार असली धन” — ये सब बातें व्हाट्सएप पर पड़कर अच्छी लगती हैं।

मगर असली दुनिया में तब फर्क पड़ता जब गरीब घर का बच्चा बीमार होता और उनके पास दवा के लिए पैसे नहीं होते।

गरीब की भूख ज्ञान से नहीं बल्कि रोटी से समाप्त होती।

उनकी बीमारी पर कविता नहीं बल्कि डॉक्टर चाहिए।

उनकी मौत को श्रद्धांजलि नहीं बल्कि न्याय चाहिए।

 तो समाधान क्या है?

क्या बस आलोचना करें? नहीं ना!सवाल यह कि क्या हम बदलाव ला सकते हैं?

अवश्य कर सकते हैं!

सोच बदलें: हर जिंदगी को समान महत्व दें — चाहे CEO की हो या रिक्शा चालक की।

मदद करें: किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में मदद करें, किसी मजदूर की चिकित्सा सहायता करें, किसी बुज़ुर्ग को राशन दें — ये छोटे-छोटे कदम बड़े बंधन ला सकते हैं।

चुप्पी तोड़ें: सिस्टम जब किसी गरीब को कुचलता हो, आवाज़ उठाएं — न कि उसे भाग्य का खेल कहें।

सच्ची संवेदना दिखाएं: त्योहारों में ही गरीबों को याद मत करें बल्कि उन्हें हर दिन इंसान समझें।

निष्कर्ष:

पैसा सब कुछ नहीं होता” — एक सुंदर कहावत भर लगता यह सुनने में अच्छी लगती है।
पर एक गरीब जिसने कभी पेट भर खाना नहीं खाया उसे यह कहावत मत दीजिए; शायद उसके लिए पैसा सब कुछ होता है — रोटी, स्वास्थ्य सेवा, पढ़ाई और गरिमा तक पहुंचाने के लिए।

अमीरों की मौत पर शोर मचता मगर अगर उसका छोटा हिस्सा भी गरीब की जिंदगी पर लगता तो शायद हर दिन कोई बच्चा भूखे ना मरता; कोई किसान करजे से झूलकर ना लटकता; कोई मजदूर यूँ ही नामोनिशान मिटाकर दफनाने के बजाय पहचाना भी जाता।

आज भारत में गरीबी नही; मगर गरीब खुद जरूर मर रहा – हमारी खामोशी में

दृष्टिकोण (Opinion):


इस लेख में एक सवाल पूछा गया – “हम बदलाव कैसा ला सकते हैं?” जवाब काफी साफ-साफ – हम खुद।

अगर हम अपने बच्चों को सिखाएं कि हर इन्सान बराबर होता और अगर सोशल मीडिया पर शोर मचाने के बजाए जमीन पर काम करें, तब शायद किसी गरीब की मौत खबर बन जाए; & उसके जीवन ने एक नई शुरुआत थमेगी।

जब कोई बड़ा व्यक्ति मरता है, तो पूरी दुनिया थम-सी जाती है। हर तरफ ज्ञान फैलता है कि पैसा सब कुछ नहीं होता।

असल दौलत रिश्ते और प्यार होते हैं। ये वही लोग हैं जो खुद ‘पद, पैसा & प्रतिष्ठा’ के पीछे जिंदगी भर भागते रहते हैं। लेकिन उसी दुनिया में एक गरीब हर रोज रिश्ते निभाता है, प्यार बचाता है।

फिर भी मर जाता है… न कोई हेडलाइन, न कोई खबर। क्यों? क्योंकि जब वो हारता है, तो या तो मर जाता है, या बेबसी में अपने आत्मसम्मान के साथ बिक जाता है। आज भारत में गरीबी नहीं, बल्कि गरीब मर रहे हैं।

भूख से, बीमारी से, कर्ज़ से, आत्महत्या से। हर दिन, हर गली में। क्यों? क्योंकि उनके पास दिखाने को कुछ नहीं होता। एक तरफ कहते हैं पैसा ही सब कुछ है, तो दूसरी तरफ कहते हैं पैसा कुछ नहीं है।

एक तरफ रिश्ते-नाते नहीं होते, दूसरी तरफ कहते हैं रिश्ते-नाते ही असली पूंजी हैं। तो असली समस्या क्या है? यही विरोधाभास? यही दिखावा? या फिर ये भाग्य या ‘दुर्भाग्य’? सच यही है: “पैसा सब कुछ नहीं होता” — लेकिन गरीब? उसे कभी पेट भरा नहीं मिला, न प्यार, न सिस्टम से न्याय।

ये सब बातें सिर्फ वॉट्सऐप की चाय होती हैं, जो असल भूख मिटा नहीं सकतीं। “रिश्ते बचाओ”, “पैसा बेकार है”, “प्यार ही असली दौलत है” — ये सब बातें WhatsApp यूनिवर्स में सुनने में अच्छी लगती हैं।

पर असली दुनिया में जब गरीब के बच्चे को बुखार होता है, और दवा के पैसे नहीं होते तब कोई motivational quote काम नहीं आता।

Author

  • Tanmay Srivastava is a digital content creator and blogger from Gorakhpur, Uttar Pradesh, specializing in finance, education, entertainment, and trending digital topics. He creates impactful content to inform, inspire, and empower today’s digital audience.

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